
डॉ. कुसुम लुनिया
समता के महासुमेरू, क्षमा के क्षीर सागर आचार्यश्री महाश्रमण के पावन सानिध्य में जैन परम्परा के महान पर्व “पर्युषण पर्वाधिराज” की साधना-आराधना करने का अपूर्व आध्यात्मिक अवसर इस बार हमें भी मिला। सुधर्मा सभा, जैन विश्व भारती परिसर, लाडनू, राजस्थान का पवित्र वातावरण सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण है।
पर्युषण पर्व के नवाह्निक कार्यक्रमों में क्रमशः खाद्य संयम, स्वाध्याय, सामायिक, वाणी संयम, व्रत चेतना, जाप एवं ध्यान दिवस के माध्यम से आत्मचिंतन और साधना का क्रम आगे बढ़ा। अष्टम दिवस “भगवती संवत्सरी महापर्व” और नवम दिवस “खमत खामणा दिवस” के साथ पर्वाराधना ने आत्मचिंतन को नए आयाम प्रदान किए।
आज के समय में क्षमायाचना पर्व की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। यह पर्व व्यक्ति को आत्मशुद्धि, आत्मावलोकन और विश्व-मैत्री की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर देता है। इसकी सुंदर भावना है—“खमत खामणा बारम्बार।”
अर्थात् अंतरमन की गहराइयों से क्षमा का आदान-प्रदान।
क्षमायाचना केवल औपचारिक रूप से “मुझे क्षमा करें” कह देने का नाम नहीं है। इसके पीछे अपनी भूल को स्वीकार करने, उसके लिए पश्चात्ताप करने और भविष्य में उसे दोहराने से बचने का संकल्प निहित है।
जैन दर्शन में मन, वचन और काया से किसी भी जीव को जाने-अनजाने पहुंची पीड़ा के प्रति संवेदनशील होना और उसके लिए क्षमा मांगना आत्मपरिष्कार की प्रक्रिया है।
क्षमायाचना करते समय कहीं-कहीं “मिच्छामी दुक्कडम” वाक्य का प्रयोग किया जाता है। वहीं, इस संदर्भ में प्राकृत वाक्यविन्यास “खमत खामणा” का प्रयोग भी किया जाता है, जिसका भाव है—क्षमा का पारस्परिक आदान-प्रदान।
इसमें केवल अपनी ओर से क्षमा मांगना ही नहीं, बल्कि दूसरे के प्रति मन में संचित वैर और कटुता को भी समाप्त करने की भावना शामिल है।
यह आत्मावलोकन, अहिंसक जीवन, संबंधों के परिष्कार और भविष्य में अपने व्यवहार को बेहतर बनाने का संकल्प है।
जैन पर्युषण महापर्व का अंतिम दिन क्षमायाचना पर्व केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं को भीतर से देखने का अवसर है।
वर्षभर के अपने व्यवहार की ईमानदारी से समीक्षा करते हुए व्यक्ति यह विचार करता है कि उसके मन, वचन या काया से जाने-अनजाने किसी को दुःख तो नहीं पहुंचा। यदि ऐसा हुआ है, तो वह विनम्रतापूर्वक क्षमायाचना करता है।
साथ ही, दूसरों द्वारा पहुंचाई गई पीड़ा को भी मन में स्थायी वैर या प्रतिशोध के रूप में संजोकर न रखने का प्रयास करता है।
यह समझना आवश्यक है कि क्षमा का अर्थ अन्याय को सही मान लेना नहीं है। क्षमा का अर्थ अपराध या गलत व्यवहार को उचित ठहराना भी नहीं है। बल्कि इसका अर्थ है—घटना से सीख लेते हुए अपने भीतर पल रहे स्थायी क्रोध, कटुता और प्रतिशोध की भावना को धीरे-धीरे छोड़ना।
क्षमा आत्मसम्मान को कम नहीं करती। इसके विपरीत, यह अहंकार को कम करके आत्मबल को बढ़ाने का माध्यम बन सकती है।
जैन दर्शन का मूल स्वर अहिंसा, संयम, समता और आत्मविजय है। क्षमा इन्हीं मूल्यों की स्वाभाविक परिणति है।
क्षमापर्व की व्यापक भावना इस प्राकृत मंगलपाठ में अत्यंत सुंदर ढंग से अभिव्यक्त होती है—
“खामेमि सव्वे जीवा,
सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ती मे सव्वभूएसु,
वेरं मज्झं न केणइ॥”
अर्थात्—
“मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें। सभी जीवों के प्रति मेरी मैत्री है और किसी के प्रति मेरा वैर नहीं है।”
यह भावना क्षमा को केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे सर्वजीव मैत्री तक विस्तृत करती है।
भगवान महावीर ने मनुष्य की सबसे बड़ी विजय अपने भीतर मानी। बाहरी शत्रु को पराजित करना अपेक्षाकृत सरल हो सकता है, लेकिन क्रोध, अहंकार, लोभ और प्रतिशोध पर विजय पाना वास्तविक आत्मविजय है।
महावीर का जीवन यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य अपनी प्रतिक्रिया का चुनाव कर सकता है।
अपमान के उत्तर में अपमान, हिंसा के उत्तर में हिंसा और घृणा के उत्तर में घृणा देने से संघर्ष समाप्त नहीं होता। समता, संयम, क्षमा और अहिंसा ही वैर की श्रृंखला को तोड़ने का मार्ग दिखाते हैं।
इसीलिए जैन दर्शन में क्षमा को कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल का प्रतीक माना गया है।
आधुनिक मनोविज्ञान में भी क्षमा को मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक कल्याण से जोड़कर देखा गया है। किसी व्यक्ति या घटना के प्रति लंबे समय तक क्रोध, आक्रोश और प्रतिशोध की भावना मन में तनाव बनाए रख सकती है।
इसके विपरीत, क्षमा व्यक्ति को किसी पीड़ादायक घटना से भावनात्मक दूरी बनाने और आगे बढ़ने में सहायता कर सकती है।
हालांकि, क्षमा को किसी मानसिक या शारीरिक रोग का उपचार नहीं कहा जा सकता। फिर भी, अपने भीतर जमा कटुता और तनाव को कम करने की दिशा में यह एक सकारात्मक मानसिक अभ्यास हो सकता है।
एक दृष्टि से क्षमा मानसिक स्वच्छता का माध्यम भी है। जिस प्रकार हम शरीर को स्वच्छ रखते हैं, उसी प्रकार मन में जमा पुरानी कटुता और वैर को छोड़ना भावनात्मक संतुलन के लिए उपयोगी हो सकता है।
मन और शरीर एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। लगातार तनाव और क्रोध शरीर की तनाव-प्रतिक्रिया, हृदयगति और रक्तचाप को प्रभावित कर सकते हैं।
क्षमा और बेहतर मनोवैज्ञानिक एवं हृदय-संबंधी स्वास्थ्य के बीच सकारात्मक संबंधों पर भी शोध हुआ है। हालांकि, इन संबंधों को किसी बीमारी के उपचार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
इस दृष्टि से क्षमायाचना को तनाव-प्रबंधन, भावनात्मक संतुलन और सकारात्मक जीवनशैली के एक हिस्से के रूप में समझा जा सकता है।
परिवार में प्रेम के साथ अपेक्षाएँ भी होती हैं। इसी कारण छोटी-सी बात कभी-कभी मन में लंबे समय तक चोट या नाराजगी बनकर रह जाती है।
क्षमायाचना पर्व पुराने मनमुटाव को पीछे छोड़कर रिश्तों को नई शुरुआत देने का अवसर प्रदान कर सकता है।
पति-पत्नी, माता-पिता और संतान, भाई-बहन या अन्य पारिवारिक सदस्य सरल शब्दों में कह सकते हैं—
“मेरे किसी शब्द या व्यवहार से आपको दुःख पहुंचा हो, तो मुझे क्षमा करें।”
कभी-कभी इतना छोटा-सा संवाद भी रिश्ते में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। यह अहंकार को कम करता है, संवाद को बढ़ाता है और आपसी विश्वास को मजबूत करने का अवसर देता है।
यहां भी क्षमा का अर्थ गलत व्यवहार को स्वीकार करना नहीं, बल्कि अपनी गलती पहचानना, उसे सुधारना और संबंध को बेहतर दिशा देना है।
व्यक्ति के भीतर का वैर जब परिवार से निकलकर समुदाय और समाज तक पहुंचता है, तो संघर्ष लंबे समय तक बने रह सकते हैं। कई बार पुरानी कटुता पीढ़ियों तक आगे बढ़ती रहती है।
ऐसे में क्षमा बदले की भावना से संवाद, मेल-मिलाप और सद्भाव की ओर बढ़ने का मार्ग खोल सकती है।
यदि व्यक्ति अपने स्तर पर वैर कम करने का प्रयास करे, परिवार संवाद को प्राथमिकता दे और समाज मतभेदों के बीच भी मैत्री और सह-अस्तित्व की भावना को मजबूत करे, तो सामाजिक वातावरण अधिक शांतिपूर्ण बन सकता है।
आज दुनिया युद्ध, हिंसा, सामाजिक तनाव, आर्थिक असमानता और बढ़ती वैचारिक कटुता जैसी अनेक चुनौतियों से गुजर रही है।
ऐसे समय में जैन दर्शन का संदेश—
“मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं न केणइ”
अर्थात् “सभी जीवों के प्रति मेरी मैत्री हो और किसी के प्रति मेरा वैर न हो”—एक व्यापक मानवीय संदेश के रूप में देखा जा सकता है।
यदि व्यक्ति अपने परिवार में, समाज अपने समुदाय में और राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के प्रति वैर कम करने का प्रयास करें, तो शांति केवल किसी समझौते तक सीमित नहीं रहेगी; वह मानवीय संस्कृति का हिस्सा बन सकती है।
यही भगवान महावीर की अहिंसक दृष्टि की समकालीन प्रासंगिकता है।
क्षमायाचना पर्व का महत्व केवल एक दिन तक सीमित नहीं है। वास्तव में क्षमा एक जीवन-दृष्टि है—अपने भीतर झांकने, अपनी भूल स्वीकार करने, दूसरों के प्रति मैत्री रखने और अहंकार से ऊपर उठने की जीवन-दृष्टि।
इस पावन क्षमायाचना पर्व पर मेरे मन, वचन या काया से जाने-अनजाने किसी को भी ठेस पहुंची हो, तो मैं हृदय से बारम्बार खमत खामणा करती हूँ।
अंत में यही कहना चाहूंगी कि क्षमा की वैश्विक स्वीकार्यता में ही इस पर्व की सच्ची सार्थकता है।
“मित्ती मे सव्वभूएसु,
वेरं मज्झं न केणइ।”
सभी जीवों के प्रति मेरी मैत्री हो और किसी के प्रति मेरा वैर न हो।
क्षमा मन को निर्मल करे,
मैत्री जीवन को सुंदर बनाए,
और अहिंसा पूरे विश्व को शांतिमय बनाए।
द्वारा
डॉ. कुसुम लुनिया
9891947000